सतनाम पन्त और हिन्दू धर्म | सतनाम पन्त क्या है? सतनाम पन्त की उत्पत्ति कैसे हुई

आज आपको इस लेख के माध्यम से बताने का प्रयास करुंगा, पन्त क्या है? और धर्म क्या होता है? आखिर हिन्दू धर्म से अलग होकर सतनाम पन्त क्यों बना |

Satnam Pant and Hinduism | What is Satnam Pant? How Satnaam Pant was born?

Satnam Pant Kya Hai Hindu Koun Satnami Ka Itihas Satnam Panth Ka Itihas

किसी भी धर्म का इतिहास निकाल कर देखा जाए तो, धर्म का उत्पत्ति किसी खास मन से हुई है|

जैसे :- हिन्दू धर्म को ब्रम्हा से माना गया है, जिसके आधार पर वर्ण व्यवस्था, वेद, ग्रन्थ को बताया गया है |

इसी तरह से, सिख धर्म, गुरुनानक जी, बौध धर्म गौतम बुध्द जी, इसाई धर्म ईशा मसीह जी, मुश्लिम धर्म पैगम्बर जी से, और इसी तरह से अन्य धर्म |

धर्म क्या है?

किसी भी धर्म को देखे तो, धर्म का प्रारम्भिक संबध मानव जन्म की उपत्ति और नष्ट से , और संस्कार से होता है, जैसे हिन्दू धर्म के अनुसार मानव का जन्म वर्ण व्यवस्था के आधार पर हुआ है |

हिन्दू धर्म वर्ण व्यवस्था के अनुसार, ब्रम्हा ने अपने मुख से ब्रम्हा को, छाती से क्षत्रिय को, वैश्य को पेट से, तो वही शुद्र को पैर से पैदा किया है |

वर्ण का अनुसार, ब्राम्हण का कार्य शिक्षा देना, क्षत्रिय का कार्य रक्षा करना, वैश्य का कार्य धन इकट्टा करना, और शुद्र इन सभी की सेवा करने का कार्य करेगा | इस तरह से हिन्दू धर्म की रीत है, जो आज भी वही चल रहा है|

सतनाम क्या है? सतनामी कौन?

इस भारत में सतनाम हमेशा से चला आ रहा है, सतनाम के मानने वाले हजारो वर्षो से है| सतनाम जीवन जीने का मार्ग है|भारत वर्ष का हमेशा से इतिहास रहा है, लोगो को जबरदस्ती हिन्दू घोषित किया गया है |

कपोल कल्पित कहानियो के द्वारा विदेशी लोगो ने इस देश पर गुलामी नीति प्रथा चलाई है, और वर्ण, जाति का भेद सभी मूलनिवासी को तोड़ने के लिए दिमाग में डाल दिया है|

आज भी लगातार यह विदेशी लोगो को हिन्दू घोषित करने में लगे है, आज 2019 से जब पहले 1672 में मुश्लिम इस देश में राज करते थे, उस समय आज से 350 वर्ष पूर्व सतनाम के मानने वाले सतनामी और जाट ने मिलकर, मुश्लिम शाशक से युध्द किया था| जो एक सतनामी की आन बाना और शान का प्रतिक है|

सतनाम क्या है?

इस संसार में कोई जाति नहीं है, कोई धर्म नहीं है, कोई पन्त नहीं है, सभी जीवन जीने का एक तरीका है, जिसे लोग धर्म के नाम से, तो वही पन्त भी जीवन जीने का मार्ग है|

इस देश के लोगो को जब कार्य के आधार पर जाति का नाम दिया गया तो, सतनाम के मानने वाले लोगो को सतनामी के नाम से जाने जाना लगा|

सतनामी कहलाना ही अपने आप में गर्व पूर्ण है, सतनामी कोई जाति नहीं, सतनामी शब्द सम्मान है|

1672 में जब नारनौल में सतनामी और औरंगजेब के साथ युद्ध हुआ था, उस समय से पहले धर्म नाम का शब्द अस्तित्व में नहीं था, केवल वर्ण व्यवस्था और भेदभाव, ऊँच नीच था, जाति था |

ऐसा नहीं है, की सतनामी लोग कभी प्रताड़ित नहीं हुए है, सतनामी को जबरदस्ती जाति के दायरे में लाया गया, दबाने के सतनामी से हटाकर चमार शब्द का प्रयोग किया गया, इस तरह से पूरा नीचे दबा दिया गया |

सतनाम पन्त की उत्पत्ति?

इतिहास से यह पता चलता है, हिन्दू वर्ण व्यवस्था के दायरे में जब बहुत पहले लोगो को लाया गया तो, बहुत लोगो ने इस वर्ण व्यवस्था का खंडन किया और वर्ण को अस्वीकार्य किया|

यही लोग आगे चलकर सतनाम पन्त का निर्माण किये, सतनाम पन्त हजारो वर्षो से चला आ रहा है, जो 1672 में सतनामी विद्रोह के साथ उभर कर आया|

सतनाम पन्त क्या है?

सतनाम वह पन्त है, जो इस संसार में सभी मानव को एक समान मानता है, सतनाम यह स्वीकार नहीं करता की, कोई मुह से पैदा ले सकता है, कोई पैर या छाती से पैदा ले सकता है, इसी को अविकार करते हुए, सतनाम की उत्पत्ति हुई है| सतनाम महिमा के निम्न गुण देखे जा सकते है|

सतनाम मार्ग का मुख्य प्रवर्तक, सन्त शिरोमणि गुरु घासी जी, बीरभान जी, जोगीदास, और कबीर जी, और अनेको सन्त और समाज सुधारको को माना गया है|

  • सभी मानव एक समान जन्म लेते है, इसलिए सभी एक समान है|
  • मनखे-मनखे एक बरोबर|
  • वर्ण व्यवस्था सतनाम पन्त में नहीं माना गया है|
  • जाति व्यवस्था नहीं मानना|
  • किसी से उंच नीच नहीं मानना|
  • किसी से छुआ छूत न मानना|
  • मूर्ति पूजा नहीं करना|
  • जीव को मारकर भोजन नहीं करना |
  • जीवो को भी मान-सम्मान देना|
  • किसी के मरने पर छूत-अछूत न मानना|
  • वास्तविक पूजा माता-पिता की सेवा|
  • देवी-देवताओ की भक्ति न करना|
  • सतनाम को मानना|
  • नशा सेवन नहीं करना|
  • घर और आस-पास प्रकृति को स्वच्छ बनाये रखना|

सतनाम शब्द और जीवन आज का नहीं, यह तो उस समय से है, जब मानव ने शब्द का निर्माण किया|

आज के सतनामी लोगो का भ्रम!

आज के सतनामी सतनाम को नहीं जानने की वजह से यह भूल जा रहे है, की आज का यह सतनामी वह सतनामी है, जो कभी वर्ण व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया, कभी मूर्ति पूजा कें चंगुल में नहीं फंसा, कभी नशा के चंगुल में फंसा नहीं|

आज का यह सतनामी अपने सतनाम जीवन मार्ग को भूल गया और अपने आप को हिन्दू समझ बैठा है| सतनामी लोगो की मज़बूरी है, हिन्दू लिखना, और कोई रास्ता भी अभी नहीं निकला है| एक समय आएगा जब सतनामी सतनाम धर्म के लिए आगे आएगा, और उनके स्वतः ही सतनाम धर्म दे दिया जायेगा|

हिन्दू कौन?

हिन्दू केवल वही है, जो वर्ण व्यवस्था को स्वीकार करें, ब्राम्हणो की पूजा करे, देवी-देवताओ की पूजा करें, मूर्ति की पूजा करें, बांकी कोई हिन्दू नहीं है|

और सतनाम में यह सभी निषेध है, इसलिए सतनामी को यह कभी नहीं भूलना चाहिए की वह कर्म से हिन्दू नहीं है, केवल मज़बूरी के नाम से हिन्दू है, और सतनामी का हिन्दू लिखना मज़बूरी है, इसी तरह से सैकड़ो पन्त है, जो अपने आप को हिन्दू नहीं मानते, जो अलग धर्म के लिए मांग कर रहे है|

वर्तमान समय में सतनाम पन्त के कमजोर होने का कारण

वर्तमान समय में सतनाम पन्त के कमजोर होने का कारण, निम्न कारण देखने को मिलता है|

  • सतनाम पन्त को न जान पाना|
  • सतनाम पन्त को भूल जाना|
  • अपने आप को हिन्दू मानना|

वर्तमान में सतनामी और सतनाम पन्त

आज सतनाम के मानने वाले लगातार सतनाम की महिमा को जान रहे है, जागरूक हो रहे है, लगातार सतनाम समाज को उठाने के लिए प्रयास रत है|

समाज को उठाने के लिए सार्वजनिक रूप से नशासेवन, मूर्ति पूजा, मास भक्षण पर समाज के द्वारा प्रतिबन्ध किया जा रहा है, जो बहुत अच्छी पहल है|

समाज के लोगो के द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है, जो नशासेवन, ढोंग ढकोसलो, मूर्ति पूजा में फंसे है, उन्हें सतनाम के मार्ग में लाया जा रहा है|

लड़की लड़का विवाह कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसके द्वारा सतनामी लोगो में एकता और सतनाम रिवाज स्थापित हो रहा है, और अत्यधिक विवाह संस्कार में होने वाले खर्च को कम करके सामूहिक विवाह कराया जा रहा है|

वर्तमान में जितने भी सतनामी संगठन है, सभी को एक करने के लिए केन्द्रीय समन्वय समिति का निर्माण किया गया है|

सतनामी समाज में व्याप्त रीति रिवाज का संशोधन किया जा रहा है, जो समाज के लिए शुभ सन्देश है, जिसमे युवा और बुजुर्ग महिला सामने आ रहे है, जिसके तहत निम्न कार्य प्रयासरत है, और अन्य …

सतनाम समाज का उद्धार कार्य

  • किसी परिवार में मृत्यु होने पर सभी समाज के द्वारा उस परिवार को आर्थिक बोझ न हो और सामाजिक एकता का परिचय देते है, मृत्यु का कुछ कर्च समाज ने उठाने का फैसला किया है| जिसके तहत सभी गाँव और क्षेत्र स्तर पर सामाजिक अनुदान राशि समाज के द्वारा दिया जाता है, और 50 किलो चावल दिया जाता है|
  • सतनाम में तीसरे दिन नहाने, और दसवे दिन मृत्यु संस्कार को संसोधित करके, मृत्यु के सीधे 7 वे दिन, मृत्यु संस्कार करने के फैसला लिया गया है, जो समाज एक लिए बहुत अच्छी पहल है|
  • मृत्यु भोज में मिठाई भोज को बंद सभी जगह किया जा रहा है, यह सतनाम के हिसाब से बहुत अच्छी पहल है|
  • सतनामी समाज में 6 वे छट्ठी मनाने का रिवाज नहीं है, छट्ठी के जगह में समाज के द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है, की बच्चे के जन्म के 1 वर्ष में जन्म उत्सव मनाया जाए, जिससे सभी बच्चे को, और परिवार मिलन समारोह मना सके|
  • मृत्यु में यह लगातार प्रयास किया जा रहा है, जिन जगहों पर, मरने पर अग्नि को सुपुर्द कर दिया जाता है, और इससे पर्यावरण का जो नुकसान होता है, उसके जगह पर शव को जमीन में दफ़न किया जाए | और शरीर के गलने पर हड्डी को निकालकर खाद बनाने के कार्य में लाया जाए | या विज्ञान के अनुसार पर्यावरण को नुकसान न हो इस तरह का उचित संस्कार किया जाए |
  • विवाह में यह प्रयास किया जा रहा है, की विवाह अधिक से अधिक सतनाम के अनुसार हो, न की हिन्दू रिवाज के अनुसार, क्योकि सतनाम में देव पूजने का स्थान नहीं है, और न ही अग्नि को साक्षी मानने का|
  • विवाह में यह प्रयास किया जा रहा है, की विवाह में अत्यधिक खर्च न हो, जायदा से जायदा एक से दो दिन करने का प्रयास किया जा रहा है |
  • नारी उत्थान के लिए नारी जाग्रति समिति का निर्माण किया गया है, जिसमे महिलाये आपस में मिलकर नारी की समस्याओ को दूर करने के लिए प्रयासरत है|
  • समाज में जो गरीब है, उन्हें पढ़ाने के लिए शिक्षित समिति कार्यरत है, जिसके तहत गरीब और प्रतिभावान बच्चों और युवाओ को बिना शुल्क के IAS, PSC, UPSC, और 1 से लेकर उच्च शिक्षा तक पढ़ाने और पुस्तक खर्च उठाने के लिए शिक्षित समिति के जागरूक समाज सुधारक प्रयासरत है |
  • सतनाम पन्त के मानने वाले लोग पुरे अकेले भारत में करोड़ से भी जायदा है, जो लगातार एक सूत्र, संस्कार, रीति रिवाज, से एक हो रहे है, और एक करने के लिए समाज लगातार कार्यरत है|
  • सतनामी समाज के द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है, जितने भी सतनामी है, वह सभी अपने नाम के आगे सतनामी लिखे, और विवाह के समय यह देखा जाए, लड़की और लड़के में कोई पारिवारिक, या खून का सम्बन्ध तो नहीं |

इस तरह से समाज सर्व समाज को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहा है, सतनाम का मार्ग बहुत ही सरल और बहुत ही कठिन है, सतनाम मार्ग को सतनाम पन्त में कोई भी भेद नहीं है, सभी उदारवादी है|

सतनाम मार्ग, सतनाम पन्त में कोई भी दुसरे जाति, धर्म के लोग सतनाम मार्ग को अपना सकते है | सतनाम का यही मार्ग है|

समाज को उठाने के लिए समाज लगातार प्रयासरत है, समाज आगे उठकर अंतरजातीय विवाह को सार्वजनिक रूप से समाज में कराया जा रहा है, और समाज में बड़े प्रेम से स्वीकार भी किया जा रहा है|

सतनाम का केंद्र बिन्दु समानता है | और सतनाम का मुख्य गुरु वास्तविक ज्ञान है|

सतनाम को जानो, सतनाम को मानो, सतनामी बनो, सतनाम मार्ग में चलो, सिर्फ कहानी में न पढ़े रहो, उच्च शिक्षा की ओर आगे बढ़ो, नौकरी, व्यापार, की ओर बढ़ो, समानता की ओर बढ़ो|

सतनामियों सिर्फ सफ़ेद कपडा, और लम्बे दाढ़ी बाल तक सिमट न जाओ |

आपसे निवेदन है, सतनाम मार्ग को जानो |

सतनाम मार्ग को अधिक जानने के लिए मुझे संपर्क करें , यह लेख योगेन्द्र कुमार सतनामी उम्र 25 वर्ष, के द्वारा सादर प्रेषित है |

पता – ग्राम चरौदी, तहसील-मालखरौदा, जिला-जांजगीर-चाम्पा, राज्य छत्तीसगढ़, पिन कोड 495695,

मोबाइल नंबर +91 9131880737

किसी प्रकार की लेख में खराबी होने पर कृपया सूचना देवे, कृपया व्यर्थ का नशा सेवन करके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर किसी के सामने बुराई, और बहस करने का प्रयास न करें, मुझे सीधे बात करें, या सामने से मिलकर बात करें|

साहेब सतनाम || जय सतनाम ||

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7 Comments on “सतनाम पन्त और हिन्दू धर्म | सतनाम पन्त क्या है? सतनाम पन्त की उत्पत्ति कैसे हुई”

  1. आपका लेख पढ़ा बहुत अच्छा लगा ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो कम उम्र में ही समाज के लिए सोचते हैं अगर यह सभी बातें आपसे अपने मन से लिखी है तो इसके लिए मैं आपको बहुत बहुत बधाई देता हूं और एक सुझाव देता कि अभी आपको आप ही ज्ञान अर्जन करना है तभी आपका सोच-समझ कि ज्यादा विकसित होगा आखिर में मैं यही कहना चाहता हूं की मुझे यह लेख बहुत ही अच्छा लगा हालांकि मैं चाहूंगा कि इसमें कुछ संशोधन किया जाए.
    जय सतनामी-जय सतनाम!!

  2. आपका लेख पढ़ा बहुत अच्छा लगा. ऊपर जो मैंने कमेंट किया है, उनमें कुछ मात्रा में त्रुटि हुआ है जिसके कारण मुझे दोबारा कमेंट करना पड़ रहा है. अगर आपने यह लेख स्वयं लिखा है तो मुझे व्यक्तिगत तौर से बहुत ही अच्छा लगा. क्योंकि हमारे लोगों में लिखने पढ़ने का खासकर अपने इतिहास से संबंधित शोध – खोज, विचार – विश्लेषण आदि के प्रति बहुत ही कम या नहीं के बतौर संख्या में रुचि रखने वाले लोग होते हैं.
    आपका लेख बहुत ही सकारात्मक है, हालांकि मैं इसमें कुछ संशोधन के पक्ष में हूं. लेकिन जिस उम्र के हिसाब से आपने यह लेख लिखा है, बहुत ही उत्साहवर्धन करने वाला है, उसके लिए दोबारा बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएं.
    मैं चाहता हूं की आप जैसे लोगों से हम मिलकर काम करें धन्यवाद.
    मुझे सतनामी – जय सतनाम!!

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